गुरु तत्व को समझने के लिए पवित्र, अहंकार रहित अंत: करण का होना आवश्यक है। श्लोक :- यज्ञिनोऽपि न मुक्ता: स्यु: न मुक्तायोगिनस्तथा। तापसा अपि नो मुक्ता गुरु तत्वात्पराड्मुखा: ।।133।। यह श्लोक स्कंद-पुराण, गुरु गीता से लिया गया है। भावार्थ :- बहुत बड़े-बड़े विधानो में व्यस्त किया याज्ञिक लोग, योगिक क्रियाओं में संगलन योगी जन तथा कष्ट साध्य तप में लगे तपस्वी लोग, जो कि गुरु तत्व से विमुख होते हैं, वे मुक्त नहीं हो पाते । मुक्ति का अर्थ होता है - जन्म-मरण के चक्कर से अलग होना, और इस चक्र से तभी अलग होना संभव होता है, जब गुरु तत्वों को समझा जाय। गुरु तत्व को समझने के लिए पवित्र, अहंकार रहित अंत: करण की आवश्यकता होती है।